रुद्रपुर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की रुद्रपुर शाखा में मासिक भंडारा कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें सत्संग प्रवचन करते हुए आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी सुश्री उमा भारती ने कहा की जन्म से मृत्यु तक बचपन से बुढ़ापे तक एक डोर निरंतर चलता है और वह है सुख को पाने का मानवीय दशा अत्यंत दुखद है । उसकी दुख की कहानी क्या है सबकी पीछे अपनी करनी जिम्मेवार है अज्ञानता का शिकार व्यक्ति पूरा जीवन क्या करता है ।
एक-एक सुख के तिनके को इकट्ठा करता है सारी शक्ति और कीमती समय सुख के लिए खर्च करता है। कहीं से भी किसी भी वस्तु की प्राप्ति हो जाए एक बेचैनी सी रहती है। सदैव इंसान के मानस पटल पर पर सुख की तलाश में वह बहुत दूर चला जाता है। किसी और ही दिशा में चला जाता है किसी और ही उलझन को बूनता चला जाता है। धीरे-धीरे जाल इतना विशाल हो जाता है कि उसका कोई छोर दिखाई नहीं देता। सुख के तिनके की लालसा उसके जीवन में ढेरों दुखों को निमंत्रण देती है परंतु कैसा आश्चर्य है। पाने की आकांक्षा कुछ और थी परंतु प्राप्ति कुछ और ही हो जाती है। आखिर इसके पीछे कारण क्या है इस कारण अवश्य ही जानकर सूझबूझ से काम लेना होगा। क्योंकि आज प्रत्येक मानव के साथ यहीं प्रतीत हो रहा है इसका कारण और निवारण हमें तुलसीदास द्वारा रचित ज्ञान दीपक प्रसंग से स्पष्ट होता है। वह इस प्रसंग में लिखते हैं कि अगर एक मनुष्य अंधेरे कमरे में एक गांठ सुलझाना चाहे तो क्या होगा। वह उस गांठ को सुलझाने की की बजाय इसे और अधिक उलझा लेगा। वह उस अंधकार में कभी भी सूलझा ना पाएगी परंतु यदि उसे कमरे में दीपक जला दिया जाए तो उस दीपक कट में मनुष्य गांठ को जल्दी सुलझा सकता है। इसी प्रकार मनुष्य आज अज्ञानता के अंधकार में विचरण कर रहा है। इस अंधकार में सुख को ढूंढता फिर रहा है परंतु कैसे मिलेगा। असंभव है इसलिए आवश्यकता है दीप जलाने की अर्थात प्रकाश करने की जब तक उसके भीतर में ज्ञान का दीपक प्रज्वलित नहीं होगा। तब तक मनुष्य दुखों का अधिकारी रहेगा और ज्ञान की प्राप्ति के लिए इसे आवश्यकता है। पूर्ण संत सतगुरु की शरण में जाने की इसके साथ साथ हैं भजन संकीर्तन भी किया गया।




