रिपोर्टर.*प्रवीण कुमार*
उत्तर प्रदेश की सियासत के केंद्र बरेली में समाजवादी पार्टी के भीतर एक बड़ा राजनीतिक भूकंप आया है। लंबे समय से सुलग रही असंतोष की चिंगारी आखिरकार बड़े धमाके में बदल गई है। सपा हाईकमान ने जिलाध्यक्ष शिवचरण कश्यप को पद से हटाकर जिले की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। अब सवाल यह है कि बरेली में साइकिल की कमान किसके हाथ होगी
कुर्सी खाली, दावेदार भारी जैसे ही शिवचरण कश्यप की विदाई की खबर पुख्ता हुई, बरेली से लेकर लखनऊ तक दावेदारों की लंबी कतार लग गई है। पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर युवा और महत्वाकांक्षी चेहरों ने अपनी जोर-आजमाइश शुरू कर दी है। सूत्रों की मानें तो अंदरखाने लॉबिंग का दौर चरम पर है और हर कोई अपने सामाजिक समीकरण और वफादारी का सर्टिफिकेट लेकर हाईकमान के दरबार में हाजिरी लगा रहा है।
चर्चा है कि शिवचरण कश्यप को हटाने के पीछे संगठन में बढ़ती निष्क्रियता और गहरी होती गुटबाजी सबसे बड़ी वजह बनी। हाईकमान तक लगातार शिकायतें पहुंच रही थीं कि जिले में तालमेल की कमी है और संगठन जमीन पर कमजोर हो रहा है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं, इसीलिए यह बड़ा संगठनात्मक फैसला लिया गया।
इस बार जिलाध्यक्ष की कुर्सी इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली। पार्टी नेतृत्व दावेदारों को कड़ी कसौटी पर परख रहा है।
क्या उम्मीदवार सभी गुटों को एक साथ ला पाएगा
क्या उसके पास जातीय और सामाजिक संतुलन साधने का फॉर्मूला है
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वह 2027 के रण में पार्टी को जीत दिला पाएगा बरेली की सपा राजनीति का नया मोड़
दावेदारों की बढ़ती सक्रियता और तेज होते राजनीतिक संकेतों के बीच बरेली की सपा राजनीति अब एक नए मोड़ पर है। जल्द ही नए नाम पर मुहर लग सकती है, जो न केवल संगठन को एकजुट करेगा बल्कि बरेली में समाजवादी पार्टी की नई दिशा और दशा भी तय करेगा।




